कहते हैं लोग, आती है बहार भी कभी
लेकिन हमें खिजां के सिवा कुछ नहीं पता।
मुड़ते हवा के साथ रहे जो सदा, उन्हें
क्यों और कब, कहां के सिवा कुछ नहीं पता।
माथा पकड के आज तक रोते रहे ये लोग
इनको गलत निशा के सिवा कुछ नहीं पता।
खंजर नहीं उठा सको, तेवर ही बदल लो
तुमको तो मेहरबां के सिवा कुछ नहीं पता।
वो क्या करेंगे रोशनी घर में कभी, जिन्हें
बुझती हुई शर्मा के सिवा कुछ नहीं पता।
जन्नत भी कहीं होती है, ये कहती है किताब
लेकिन हमें यहां के सिवा कुछ नहीं पता।