एक बार बोल के तो देखतें !!
अंदर का तूफ़ान थम नहीं रहा .....,
बाहर सब कुछ शांत पड़ा है ।
जूठी मुस्कान लिए गुमतें है ....
अंदर ही अंदर घुटते है ।
वैसे कुछ बि नहीं था .....
लेकिन था बहुत कुछ ।।
करोड़ों की भीड़ में है रोज़ का आना जाना...
फिर भी इस भिड़ मे अकेले है ।।
लगता सब दिमाग़ का खेल है .....
सब होता ही है खेल - खेल मे ....
कुछ था तो ....एक बार बोल के तो देखते !!!
Poetry by • Jill शाह •