‘सो गए’ : दीपक रावल
(मुक्त ग़ज़ल )
चलते चलते थक कर सो गए
मौत आई तो हम भी सो गए
भूख थी, रोटी भी थी साथ में
एक निवाला खा न सके, सो गए
तुम्हारी सियासत अब तुम जानो
हमारा क्या है, देखो हम सो गए
चलो कहानी हमारी ख़त्म हुई
तुम सुनाते रहो हम सो गए
अँधेरे में जो दीप जलाया था
अब बुज़ा दो इसे हम सो गए