हर आदमी की जुबां पे हर वक्त टोकरे जहां रखा है
मगर वो बदनसीब सोचता ही नहीं की तू इस जहां में नहीं तो कहां रखा है
ख़ुद ठोकर मार कर उस परावर दीगर के दस्तकों पर
अब खुद ही देख ले तेरा माथा कहां रखा है
तू सोचता था कि कभी सर को झुकना ही नहीं है मुझको
मगर देखले तेरा सर तेरी ठोकरों पर जा रखा है