Kavita Verma लिखित कहानी "देह की दहलीज पर - 16" मातृभारती पर फ़्री में पढ़ें
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मम्मी कई बार दबे शब्दों में इशारा कर चुकी थी कि जवान आदमी ज्यादा दिन अकेला नहीं रह सकता इसलिए उसे कैरियर के साथ ही अपनी गृहस्थी पर भी ध्यान देना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि वक्त हाथ से निकल जाए। प्रिया सुयोग से बातें करती उसकी खुद के प्रति दीवानगी देखती तो सोचती क्या वह ऐसा कर सकता है? क्या वह उसके अलावा किसी और के साथ.... ।उसका दिल कहता नहीं और दिमाग कहता कि मम्मी का अनुभव गलत नहीं हो सकता। दिल कहता मेरा सुयोग ऐसा नहीं है वह जानता है कि सिर्फ वह नहीं मैं भी अपनी जरूरतों को जज्ब कर रही हूँ दिमाग कहता फिर भी वह है तो पुरुष। स्त्री अपनी इच्छाओं को दिमाग से काबू कर सकती है लेकिन पुरुष शरीर के आगे मजबूर हो जाता है। दिल दिमाग की इस जद्दोजहद में प्रिया बुरी तरह कंफ्यूज हो जाती वह जिस बात पर भरोसा करना चाहती वही उसे उस पर भरोसा नहीं करने देती।