आक्रोश (लघुकथा)
""आज फिर मानवता शर्मसार हुई, आज फिर एक मासूम शिकार हुई....क्या यही संस्कार देते हैं सभी अपने बच्चों को"".... .सुबह सुबह अखबार पढ़ते मेहताजी ने दांत पीसते हुए खबर पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया दी और नित्य कार्यों में व्यस्त हो गए। इतने में दरवाज़े पर घण्टी बजी , मिसेज़ मेहता किचिन में से बड़बड़ाती हुई आईं और दरवाजा खोला।
"" पता नही कौन सुबह सुबह परेशान करने आ जाता है। ""..
सामने गुप्ताजी दांत पीसते हुए खड़े थे और कह रहे थे...
""अरे अपने लाडले को सम्भालो आज फिर सुबह सुबह नुक्कड़ पर खड़े होकर स्कूल जाती लड़कियों से छेड़खानी कर रहा था । पिट गया ,बड़ी मुश्किल से बचा के लाया हूँ।""....😠
अतुल कुमार शर्मा " कुमार "