हाँ,यह सच है,
तुमने मुझे स्वीकार किया,
हम चाहे जैसे भी हों,
अन्यथा,हम होते ही नहीं,
तूने देवी-देवता बनाये,
उनकी पुनरुक्ति नहीं बनाई,
राम एक,
कृष्ण एक,
कबीर एक,
रहीम एक,
गुरुनानक एक,
दुबारा किसी को रिपीट नहीं किया,
तूने हर एक को अनूठा बनाया,
अद्वितीय बनाया,
चाहें हम हों,
या
देवी-देवता,
नहीं चाहत है तुम्हारी
कि हम राम या कृष्ण बन जाये,
फिर...????
कुछ जो हम ही बन सकते हैं,
जो हम हैं,
यही चाहत है तुम्हारी..??
नहीं बन सकते,
सुन लो नहीं बन सकते,
क्योंकि,
हम अहंकारी है,
हम क्रोधी है,
हम ईर्ष्यालु है,
वासना से भरे हैं हम,
इसलिए......!!
करुनेश कंचन