# उग्र
कब तक गठबंधन होंगे
नभ,धरती और भूतल में,
जाने कितने क्रंदन होंगे?
कितने -कितने उग्र बने हम ,
चमगादड़ से लटक रहे है।
संवेदन को बना खिलौना,
हम सब ही तो भटक रहे हैं।
आओ सोचें,करें साधना,
जब न आना-जाना होगा।
ख़ाली मन को कर लें यदि हम,
पीड़ा नाम अजाना होगा।।