सृष्टि के पालक शान्ताकारम् , फिर चीख पुकार क्यों होती है
पूजा करतें हम आदर्शों की , फिर मानवता क्यों रोती है
कर्मों से किनारा करते हम , पुरुषत्व की दुनिया क्यों सोती है
जिंदगी में ढूंढ़ते सरल राह , जिंदगी जिंदा लाश क्यों ढोती है
जब सूत्र छिपा है शांति में , तो जीवन में उथल - पुथल क्यों होती है
ढोंगी हम बनते जीवन में , फिर हमारे पापों को गंगा क्यों धोती है
ऐसा कुछ भी नहीं जीवन में , जिसे पाना मुश्किल होता है
एकाग्र शांत मन जब होता , मानव सफलता के बीज तब बोता है
सागर है शांत , पर्वत भी शांत , शीतल बयार भी बहती है
है प्रकृति भी शांत , है शांत गगन , यह शांति की भाषा कुछ कहती है
जीवन प्रवाह यूं बना रहे , तो शांति की दुनिया बसानी है
जीवन निष्कंटक बना रहे , यही शांत दुनिया की कहानी है
#शांत