नज्म़ नहीं ये तो ज़ज्बात हैं मेरे,
बेतरीब से हालात हैं, मेरे,
कुछ बेरंग से, कुछ बेमोल के,
दिल पे लगें, आघात है गहरें.....
कुछ कसक बन उभर रहें,
कुछ ठसक बन अटक रहें,
कुछ धूमिल सी यादों के,
ताज़ा जख्म़ हैं, मेरे....
नासूर सी यादों का जख़िरा,
साथ हैं, मेरे....
कभी बिखरा हुआ सवेरा,
कभी रात का स्याह अंधेरा,
कभी टूटी हुई चुड़ियों से,
दिल पर लगा पहरा.....
रूठे हुए सारे श्रृंगार है, मेरे..
क्यूं जिंदगी नहीं हैं, मेहरबां,
क्यूं क़िस्मत है, खफ़ा खफ़ा,
क्यूं, अक्स अपना ही देख,
नज़रों से फिसलतें है, रेगिस्तां.....
नज़रों से बहता दर्द का दरिया,
बस पास है, मेरे...
सुकून की उम्मीद नहीं,
साथ की हसरत नहीं,
समझे किसे अपना,
बेमतलब कुछ मिलता नहीं,
पग पग लगी ठोकरों से,
पैर अब लहुलुहान है, मेरे....
वक्त बेमुरव्वत सा बढ़ रहा,
मुद्दत सांसों की सिमट रहीं,
जीवन बीच भंवर में फंसा है,
और किश्ती बिन पतवार, के
भटक रहीं.....
दुश्मन बनें हालात हैं, मेरे,
नज्म़ नहीं ये हालात हैं, मेरे,
खुने दिल से लिखें,
रद्दी से ज़ज्बात है, मेरे....!!
📝📝नेहा चौधरी की कलम से✍️✍️