खुदा से ज्यादा उनको एहमियत दी थी
कहीं इस बात से खुदा नाराज़ तो नहीं हो गए ??
आख़री ख्वाहिश तो फाँसी पाने वाले की भी पूछी जाती है
तुम इतने बेरहम कब से हो गए ??
घमंड कहीं उड़ा ना ले जाए मुझको तिनके की तरह
मैं ज़मीन पे अपने कदम रखती हुँ ||
नहीं जाना पड़ता मुझको मंदिर रोज़ रोज़
मैं तो अपने सर पर माता पिता का हात रखती हुँ... |||