शिकायतें
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उसने कहा
तुम इश्क लिखती हो
मैंने हंसकर कहा
नही, मैं तो इश्क को जीती हूँ
उसने कहा
मुझे तुमसे प्यार है
मैं मुस्कुराई फिर कहा
नहीं, तुम्हें सिर्फ खुद से प्यार है
उसने कहा
मुझे तुम्हारी गिरफ्त में रहना है
मैंने खामोशी से मुस्कुरा दिया
खुद तुमसे बंधकर, तुम्हें आज़ाद रखा है।
उसने कहा,
अब खामोश भी हो जाओ
मेरे लब उलझ कर बुदबुदाए
अभी मैने कुछ कहा ही कहाँ है
उसने कहा
मुझसे नज़रे तो मिलाओ जरा
मेरी नज़रों में सवाल उतर आया
तुम्हारे इतर मैंने देखा ही क्या है।
विनय...दिल से बस यूँ ही