मानव सदा विवश हो जाता,लिखे हुये भाग्य के आगे।
वह कभी उठे तो कभी गिरे, नतमस्तक है विधि के आगे।।
कहते सारे सौभाग्य से,जग में मानुष तन मिलता है।
कर्मभूमि श्रम जल से भीगे, प्रसून भाग्य का खिलता है।।
वेद पुराण हमें सिखलाते,सब भाग्य लेख के दास हैं।
जिसका राजतिलक होना है, उसको भी मिला वनवास है।।
भाग्य के हाथों विवश हुये, बैरी अपनों के बन जाते।
यदि महाभारत लिखी भाग्य, तो हाथ रक्त से सन जाते।।
#भाग्य