मां* की ममता
है बड़ी अनमोल
क्षमा, दया, करूणा, उसके शील
वह होती धीर, गंभीर, सुशील।
वह होती क्षमा का मूल
देती है खुशियां
मिटाती अवसाद
*मां* ही पूजा है
उसके जैसा जहां में न कोई दूजा है।
वह है अनमोल रत्न
खिलाती अपने आंसूओ से चमन
जिंदा जन्नत है
जमीं पर।
दूर करती वह रात काली
रोशनी पाता उसी से सारा जहां
*मां* के योग्य नहीं कोई उपमा
वह है निरूपमा।
*मां* जिंदा मूरत है भगवान की
त्याग, तप का पर्याय
दर्द की दीवार है
कैसे कोई बराबरी करे उसके बलिदान की।
नहीं चुका सकता कोई दाम
उसके अनमोल एहसान का
*मां* की ममता का मोल
नहीं कोई सकता तराजू से तोल।
*विश्व मातृ दिवस को नमन*