#ग़ज़ल
#ग़रीबी_से_सियासत_है
ग़रीबी से सियासत है, सियासत से ग़रीबी है ।
यहाँ सबको यही दिखता, कोई किसका करीबी है ।।
सभी अपनी लिये ढपली सभी का राग अपना है ।
अलापे जा रहें बे शुर यही तो बदनसीबी है ।।
भला अब आदमी को आदमी कैसे बनाएं हम।
कोई छोटा कोई मोटा यहाँ इतनी रकीबी है।।
हमीं से दोसती करता हमीं से घाट करता है।
फरेबी हर दफ़ा कहता वही मेरा हबीबी है।।
हक़ों की बात करता है दबाकर हक़ जो बैठा है।
हमेशा साथ रखता है ओ जो खोटी ज़रीबी है।।
-Panna
हबीबी=मेरा प्यार
रकीबी =दुश्मनी
ज़रीबी=ज़मीन नापने के जंजीर को ज़रीब कहते हैं