Hindi Quote in Microfiction by Kavita Verma

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बहुत मिन्नत करने के बाद उस दिन वह मिलने आने को तैयार हुई। वही नदी का किनारा वही छितराया पेड़ वही चंचल शोख हवा। वह दूर से उसे आते देखता रहा लेकिन वह कुछ अलग सी लगी। पास आने पर देखा आज उसने कुछ ज्यादा ही मेकअप किया था। चेहरे पर गुलाबी परत आँखों को दो काली लकीरों से घेर सुडौल आकार में ढाला गया था और सुर्ख रंग से होंठों को कुछ यूँ उभारा गया कि उसके बोलते समय दृष्टि उन्हीं पर टिकी रहे।
वह देर तक उससे बातें करती रही उसे छोड़ माता-पिता की मर्जी से शादी करने की मजबूरी गिनाती रही। वह खामोश उसके होठों से निकले शब्दों को चुनता रहा। क्या कहता किस हैसियत से कहता एक मजदूर पिता का बेरोजगार बेटा।
अचानक वह पूछ बैठा वह करता क्या है?
अरे क्या नहीं करता बहुत बड़ा बिजनेस मैन है बड़ी बड़ी फैक्ट्रियों का मालिक। उसकी आवाज में खनक आँखों में चमक तैर गई।
अचानक उसे लगा कि उसके चेहरे की मेकअप की सभी पर्तें भरभरा कर गिर गईं और वह बेहद बदसूरत दिखने लगी।
उसने नजर झुका कर इतना ही कहा कि मुझे टाइमपास क्यों समझा और पलट कर चला गया। अब वह उसे देखना नहीं चाहता था।
#चेहरा

Hindi Microfiction by Kavita Verma : 111422808
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