वाग बाण
थी वो अति कोमल, जैसे नाम था वैसे ही था हृदय भी कोमल
हसती थी, खिललाती थी, जैसे सुबाह की हो कोमल धूप ।
मात पिता की थी वो लाडलि, भाई बहनो की थी वो दुलारि;
उसकी सहेलियां उसे चिढा कर बुलाते थे नाजुक नार
शादी के बाद बदल गया सब कुछ; ससुरालमें उसपर छुटतेथे तीर अपार;
ससुराल आते ही, रहने लगी वो बुझी बुझी, उदास और बेकरार
कोमल दिल, कोमल काया, और मन भी था अति कोमल जो हो जाता था घायल ।
वाग बाण सुनकर, कोमल के कोमल हृदय पे लगते थे घाव, जैसे तिक्क्षण तीर ।
लगती थी नाज़ुक जिगर पे ठेस, पर चुप चाप सेहति रही वो पीड़ ।
मानों कोई नहीं था उसका भले थी आजू-बाजू स्नेही जनों की भीड़
टुटे सपने, टूटी पायल, कोमल होती रही वाग बाणो से घायल
कब तक जारी रहेगा यह सिल सिला, कब तक ! कब तक ! कब तक !
खुद ही बडबडायि, जब तक है श्वाष तब तक, तब तक, तब तक !
Armin Dutia Motashaw