मनुष्य पैदा होने से मरण शैया तक का सफर उसका जिज्ञासा में ही बीतता है माँ की कोख से जन्म लेते ही रोता है तो समाज के बड़े बुजुर्ग कहने लगते है रोने में पुकार रहा है में कहा हूं ये भी उसकी जिज्ञासा ही है कि वो जानना चाहता है कि किस लोक में आ गया हूं, इसके बाद जब माँ अपनी गोद का स्पर्श करती है तो भ जिज्ञासा वश माँ को स्पर्श करता है अपने कोमल हाथों से पैरों से फिर ये मानकर की में माँ के आगोश में सुरझित हूं रोना बंद कर देता है या कम कर देता है । इंसानी प्रवर्ति का सम्पूर्ण सफर बस जिज्ञासु रूप में ही बीतता जाता है,बचपन मे नए नये खिलोने से खेलकर,अपने परिवार के लोगो को पहचानने की जिज्ञासा, नये नये शब्दो को सीखने की जिज्ञासा, घुटने के बल चलने,फिर खड़े होकर चलने की फिर पाठशाला जाने की,फिर उच्च शिझा प्राप्त करने,फिर नोकरी प्राप्त करने,फिर विवाह करने,फिर अपना परिवार बढ़ाने फिर उन्हें पालने और अपने बच्चों का उज्ज्वल भविष्य बंनाने की जिज्ञासा, फिर अपना बुढ़ापा स्वास्थ्य रखने की जिज्ञासा बस यूं ही जिंदगी के आरंभ से जिंदगी के अंत होने तक का पूरा सफर मानव का जिज्ञासु प्रवर्ति के गुलाम बनकर ही व्यतीत हो जाता है ।
*********कमलेश शर्मा "कमल" 26/04/20******
#जिज्ञासु