अक्सर ऐसा होता है कि
हम अपनी यादों को रख कर
भूल जाते हैं...
बरसों बाद आज अलमारी को खोला तो...
जाने कितने सफ़हे मिले
जो लिखे थे तुम्हारी याद में
कुछ मुड़े-तुड़े टुकड़ों पर लिखे थे
कुछ टिश्यू पेपर पर
कुछ तो लिख दिया था होटल के लेटर हेड
तुमसे बात करते-करते
कुछ लिखे थे तब जब
35000 फ़ीट की ऊंचाई पर था
कुछ बैठे-बैठे ऑफिस में
बॉस की नज़रों से बचा कर लिख दिया था यूँ ही
कुछ हिंदी में लिखा था
कुछ इंग्लिश में लिखा था
और कुछ लफ़्ज़ों को तो पढ़ना भी मुश्किल हो गया
जैसे तुम्हें समझाना मुश्किल हो गया था
ये जिंदगी भी अज़ब है
कुछ दरवाजों को बंद कर देती है सदा के लिये
और जब बंद खिड़कियों को खोलती है तो
दिल फिर उन्हीं लम्हों को तलाशता है
जिसे वो छोड़ आया था वो...पीछे...बहुत पीछे...
बरसों बाद आज अलमारी को खोला तो!!!
Part II...
© रविश 'रवि'