कला की व्याख्या करना ही कला को समझ लेना है, जबकि सत्य यह है कि आज तक कोई भी कला की संपूर्ण व्याख्या नहीं कर पाया है। आज तक मानव ने जो भी ज्ञान प्राप्त किया है, जिस संस्कृति और सभ्यता का निर्माण किया है और साहित्य, संगीत तथा कला को जो भी जाना और समझा है, उसकी व्याख्या बड़े-बड़े विद्वान भी उचित ढंग से नहीं कर सकते हैं, क्योंकि वे इन विषयों पर एकमत नहीं है। प्राचीन भारतीय साहित्य की एक साहित्यिक रचना ‘शिवसूत्र’ में वस्तु का रूप सुंदर बनाने वाली विशेषता को कला बताया गया है। साहित्य , संगीत , कला से विहीन मनुष्य को पूँछ रहित पशु के समान कहकर, कला के उच्च स्थान एवं महत्व को मानव जीवन में स्थापित किया गया है। भारतीय विद्वानों ने प्राणतत्व ‘रस’ से परिपूरित रचना को कला माना है। आज तक कला की कोई संपूर्ण व्याख्या नहीं कर पाया है और ना ही कला की परिभाषा सूचित हो सकी है। भारतीय मनीषियों के दर्शनिक विचारों के आधार पर कला को ईश्वर की कृति की अनुभूति माना गया है। मानव ने आज तक जो ज्ञान प्राप्त किया है, या जिस संस्कृति और सभ्यता का विकास किया है और साहित्य , संगीत तथा कला की सृजन या रचना की है , उस काल की परिभाषा करने में विद्वान एकमत नहीं है , अनेकों विद्वानों ने कला की परिभाषाएँ अपने – अपने ढंग से अलग – अलग रूपों में प्रस्तुत की है जो विचारणीय है—
1. ऋग्वेद की ऋचा हिरण्यगर्भा: समवर्तताग्रे इस बात का प्रमाण है कि समस्त सत्य, शिव और सुंदर परमात्मा से ही अद्भुत है। सौंदर्य की शक्ति महान है और कला भी इसका अपवाद नहीं है। कला अनंत है और सौंदर्य भी अनंत है। परमात्मा के सौंदर्य की विज्ञप्त – चेतना ‘कला’ कहलाती है
2. आरूपवदेव हित सधानत्वाद। परमेश्वर का साकार और निराकार रूप जिस रूप में भी अभिव्यक्त हुआ है उसकी अनुकृति ही ‘कला’ है। जो अभिव्यंजना आंतरिक् भावों का प्रकाशन करती है वह कला है
3. कला में मनुष्य अपनी अभिव्यक्ति करता है।
4. ईश्वर की कृतत्व- शक्ति का वह संकुचित रूप जो हमको बोध के लिए मिलता है ,वही कला है
5. कला शब्द मनुष्य ने इसलिए बनाया कि उसके द्वारा वह अपने आंतरिक अनुभूति के सत्य को प्रकट करना चाहता था। अता अनुभूति की अभिव्यक्ति ‘कला’ है
6. कला वास्तव में शिवत्व की उपलब्धि के लिए सत्य की सौंदर्यमयी अभिवक्ति है
ER. kamalakar Singh
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