जिंदगी और मौत के बीच के फासले को कम करते हो तुम
इंसान की साँसों में जहर के जंगल उगाते हो तुम
तब्लीगियो , ये कैसी जमात है तुम्हारी ,
जो करती है शर्मसार सारे बंदों को जो हैं खुदा के
न करेगा माफ़ तुम्हें वो भी
न होगी नसीब तुम्हें दो गज जमीन
न उठेंगें तुम्हारे जनाजे
न कुबूल होंगीं तुम्हारी फरियदें
गर न तौबा की तुमने अपने गुनाहों से ।
छोड़ दो जिद इंसानियत को कत्ल करने की
जो खुदा कहता है एसा कुछ करने को तो
छोड़ दो उसे भी
जो मर रहे हैं या मर जायेंगें तुम्हारी जल्लादी हरकतों से
रूहें उनकी छोड़ेंगी तुम्हारा पीछा न कभी भी
तब भूतों के बीच कटेगीं तुम्हारी जिंदगियां
कायनात के आखिरी मंजर तक ।
वक्त रहते समझ जाओ पत्थर पर लिखी जबानो के हर्फों को ,
वरना वक्त कभी किसी को माफ़ नहीं करता ।
सुरेंद्र कुमार अरोड़ा
साहिबाबाद