हुआ जो उनका दिल घायल, हमारे कटुक बचनों से
छुपाते फिर रहें हैं दिल, वो मुझसे और स्वजनों से
छुपी पीड़ा दिखा सकते नहीं, वो दुनिया वालों को
किया अपराध जैसे वो, घिरे हैं इन सवालों से
खता को भूलकर मेरी, बड़ा दिल उसने दिखलाया
नम्रता देखकर उनकी, मै पछताया और शरमाया
मृदुल गात और नरम दिल की, मालकिन थीं वो
मधुर वचनों से हर्षाया, हमारी रात और दिन थीं वो
करके उपहास उनका मैं, भयंकर भूल कर बैठा
करूं मैं सामना कैसे, ये सोचूं और घबराऊं
मांगकर क्षमा उनसे दिल को, अपने कैसे समझाऊं
अबोध निश्छल रूप सी, निर्मल नदी थी वो
किया पावन मुझे अपना, पिलाकर प्रीति का अमृत
वो निर्झरणी है निर्मल सी, वो करती निष्प्राण को जागृत।।
#नरम