कैसे भुलाऊं उस नमी को मैं।
जो बिछड़ते वक़्त तेरी आंखो में थी।।
कहना चाहती थी शायद कुछ मुझसे।
पर कह ना पाई थी कुछ मुझसे।।
थरथराते होंठों पर नाम मेरा था।
पर हाथों की लकीरों से गायब था।।
आज भी रखा है सम्भाल कर रुमाल वो
जी बिछड़ते वक़्त तेरे हाथ ने मुझे सौंपा था।।
✍️निमिषा