बीत गए वो क्षण जवानी, जब चरम पर थी
छुपकर उनकी नजरों से, देखते उन नजारों को
बचाकर अपने को जब भी, गुजरते हैं गली से वो
हुआ सहरा ज्यों सावन मास, दिन पतझड़ के अब आए
आयी ठंडी हवा तो यूं लगा, सहरा में बहार आई
लगा ऐसे की रेगिस्तान में, हरियाली है ज्यों छाई
उठाकर नयन देखा जब, अचंभित सा नज़ारे को
दिखा जब वो सुधा सा रूप, लगा जैसे वसंत आया