रात भी वैसे ही सर मूंदे आती है
दिन भि वैसे ही आंखे मलता जागता है
तारे सारिरात जमहाईया लेते है
सबकुछ वैसे ही चलता है
जैसे चलता था जब तुम थी
काश तुम्हारे जाने पर कुछ फर्क तो पड़ता जीने में
प्यास न लगती पानि की या नाखून बढ़ना बंध हो जाते
बाल हवामे न उड़ते या धुआ निकलता सांसो से
सबकुछ वेसेही चलता है
बस इतना फर्क पड़ा है मेरी रातों में
नींद नहीं आती तो अब सोने के लिए
एक निंदकी गोली रोज निगलनी पड़ती है
सिर्फ ऐहसास के तुम पास हो
सिर्फ ऐहसास की तुम नजदीक हो ।
गुलज़ार..