चांदनी रात में कुहस में घिरे रहते हो
श्रृंगार करूँ कैसे?
दुःख लिए मन में, होठों से मुस्काते हो
रातभर जगे बेचैन रहे, दिन में कुम्हलाते हो
श्रृंगार करूँ तो कैसे
उदासी का क्या है कारण , नहीं बताते हो
अकेला मान खुद को, अपनों से जुदा हो जाते हो
श्रृंगार करूँ तो कैसे
मन की मन मे रख, सब छिपाना चाहते हो
नयन टकराते नयनों से, पर कुछ न कहते हो
श्रृंगार करूँ कैसे
पलकों के किवाड़ लगा, आँसू छिपाते हो
दीवारों से कहते मन की, मुझसे कह न पाते हो
श्रृंगार करूँ तो कैसे
उथल-पुथल मेरे भीतर भी मचा करती है
कुछ टीस मुझको भी हुआ करती है
बात से बात में, न घुल मिल पाते हो
श्रृंगार करूँ तो कैसे
रोज जब्त करते हो दर्द अपने भीतर
मुझसे दर्द का कतरा भी साझा न कर पाते हो
श्रृंगार करूँ कैसे
स्वरचित-----
सत्येन्द्र कात्यायन"सत्या"
#चरण