भावुकता के बहने के पल कुछ समय के ही होते है पर यदि उन पलों में निहित जनों का सिर्फ स्वार्थ पूर्ण रवैया का प्रतिशत ज्यादा हो जो अपने निस्वार्थ प्रेम को वेबफुफ बनाकर भविष्य में हानि पहुचाये,फिर अपने को पता चले कि सामने बाले ने अपने सरल मन एवं अपने निश्चल पेम को धोखा देकर भावुकता की भावना में बहाकर छल किया गया है तो फिर आत्मिक दुख होता है और आगे यदि कोई सही व्यक्ति मदद के लिऐ गुहार लगता है तो अपना मन उसे संदेह की परिधि में ही रखता है मदद करने में सकुचाता है तब तक शायद सही व्यक्ति की सही समय पर मदद करने में कभी कभी देर हो जाती है । मेरा एक मत है इंसान को भावना प्रधान होना चाहिए किंतु भावुकता में बहकर कोई भी निर्णय लेने के पहले दस बार आत्मा की आवाज़ भी सुननी चाहिये ताकि सही व्यक्ति की मदद भी हो सके ।
#भावुकता