संसार का कोई भी प्राणी स्वयं से मृत्यु की इच्छा कभी नहीं करता
अगर कोई करता है तो
इसका अर्थ बिल्कुल नहीं कि वह विषम परिस्थितियों के सामने झुक गया
हो सकता है उसे एहसास कराया गया हो
की इस शून्य भरे संसार में
उसकी जरूरत नहीं
वह ठीक उसी प्रकार एक अवांछनीय तत्व है
जैसे घर में रहने वाली चीटियां, छिपकलियां,चूहें, झींगुर,गेहूं में पड़ा हुआ वह घुन
सब्जियों में रहने वाले ओ हरे रंग के बदबूदार कीड़े
जिन्हें कोई पसन्द नहीं करता
परन्तु ये सब उस व्यक्ति की तरह ढीठ पड़े रहते हैं
मृत्यु की इच्छा लिए।
~सिद्ध साहित्य