काफी खुलकर चर्चा करना चाहता हूं मैं इस विषय पर क्योंकि हमने व्यर्थ में ही काफी बेइज्जत कर दिया है इस शब्द को । परिवार के 10 सदस्य बैठे हो और बात आए प्रेम पर तो कुछ शर्म सी महसूस होती है मैं पूछता हूं क्यों ???? अगर तुम्हारी नजर उसे ठीक तरीके से देखने के योग्य नहीं है तो उसमें प्रेम की क्या गलती है?? प्रेम संवेदना है जो हर जीव को दूसरे जिव के प्रति होनी ही चाहिए । यह जीवन का आधार है कुछ अपनी ही मनघड़त परिभाषा में उससे मत बिठाओ। इसीलिए कुछ विभाग और प्रश्न से इस पर बात करना चाहूंगा
१) किस से प्रेम करें ?
सभी से करो चाहे इंसान हो या जानवर पर पहले अपने आप से करना सीखो
जो कभी खुद से प्रेम नहीं कर पाया वह दूसरों को कैसे प्रेम कर सकता है ? जो चीज तुम्हारे पास ही नहीं है वह दूसरों को तुम कैसे दे सकोगे? २) भीख मांगना बंद करो
कई बार कितने लोगों से सुना है कि मुझसे कोई प्रेम नहीं करता , मुझसे कोई बात नहीं करता, क्यों मांग रहे हो ऐसी भीख?? खुद से करो ,तुमसे ज्यादा तुम्हारे लिए वफादार और कौन होगा?? और अपनी मानसिकता बदलो । निश्चित रूप से किसी एक व्यक्ति का प्रेम तुम्हें नहीं मिल पाया है और तुम दोष सभी को दे रहे हो। उस व्यक्ति के अनुराग में तुम इतने अंधे हो गए हो कि तुम्हे दूसरो का प्रेम दिखाई ही नहीं दे रहा है। ३) प्रेम सीमित नहीं है
हमने प्रेम को सिर्फ शरीर तक ही सीमित रखा है। प्रेम के तीन स्तर है शरीर से होने वाला , मन से होने वाला और रूह यानी की आत्मा से होने वाला हम शरीर के स्तर पर होने वाले प्रेम मैं ही इतने उलझ गए हैं कि हम पूरी तरह से दूर हो गए हैं आत्मा और मन से होने वाले प्रेम से ।
परमात्मा इस संसार में है यह बात नी:संदेह सत्य है ।परमात्मा किसी वस्तु से नहीं सिर्फ प्रेम से मिलता है यह भी सभी जानते हैं फिर भी लाख कोशिश करने के बाद भी हमें वह मिला नहीं । क्यों???इसका सीधा सा कारण मैं समझता हूं कि हमारा शरीर तक ही होने वाला सीमित प्रेम, जबकि परमात्मा तो निराकार है उसका शरीर कहां से लाओगे??? ४) रूपांतरण क्यों??? प्रेम में रूपांतरण और प्रेम का रूपांतरण दोनों ही काफी अयोग्य है
जिसकी बात अगली पोस्ट में करूंगा।