सुन जरासा आज कैद तू क्या हुवा ।
आज यू कितना तू परेशान ओ गया है।।
अरे जरा सोच उस औरत के बारे में।
जिसे बरसो से तूने घरमे कैद रखा है।।
बर्दास्त करती है वो तेरे सारे सितम।
जब एक बार बगैर इजाजत वो घर निकलती है ।।
परदा में उसे महेफुस मानने वाले सुन।
आज तू एक दिन भी चहेरा न ढंक पाया है।।(#मास्क )
इस बेरुखी को तेरी हरदम सहती रही वो।
बोलना आंखे से अंधे उसका दर्द क्यों न देखा तूने।।
देख ठीक से कपड़े पहनो, में कहता हूं वो करो।
मेंरी बात क्यों नही मानती, मनमानी नही चेलगी तेरी।।
औरत को केसी आजादी ? सर पे नाचेगी वो।
फरमान कहकर बरसो से आज़ादी छीन राखी तूने।।
क्या राज नही आ रहा ये तेरा घर पिंजर।
जिसमे बरसो काटे है मेने होठ से मुस्कुराकर।।
"भावु" देखना समय एकदिन सबका आता है ।
दूसरों पे रौफ जमाता है वो पलट कर वापिस आता है।
भावना जादव (भावु)