खंडहर हो चुका ये शहर आपके बिना,
न जाने कितनी हवाँए बह चुकी.....
वो आप-सी न थी।
आप गुजरते थे तो जैसे महक उठता ये सारा शहर मेरा,
जान आ जाती इन बेजान फिज़ा में,
और गुनगुना उठती ये सारी कायनात।
सुना हो चुका ये शहर आपके बिना।
आप थे तो जैसे गुँजती थी सारी हवाँए,
झुम उठते सारे फूल, और खिलती थी सारी रंगते।
मानो बहार थी मौसम में,
.......था जैसे कोई त्यौहार रोजाना।
और अब.....न जाने क्युँ?
खामौश हो चुका है ये सारा शहर आपके बिना
सच मे.....
खंडहर हो चुका है ये शहर आपके बिना।
-- Yashkrupa
Shital Goswami (Krupali)