फ़िर - फ़िर लिखता हूँ और मिटाता हूँ
महल अपने सपनों का दर - रोज़ मैं गिराता हूँ
जब भी हो जाती है जीने की उम्मीद कम मेरी
बाज़ार से एक मुठी फ़िर खरीद लाता हूँ
यूँ ही बस तफरीह के लिए मुझे गिरा देता है वो
मैं समेट के खुद को हर सुबह फ़िर उठाता हूँ
बार - बार टूट जाती है तस्वीर मेरे ख्वाबों की
पर ढीट हूँ हर बार फ़िर से बनाता हूँ