चेतना का अर्थ है संपूर्ण ब्रह्मांड़ को अपना ही अंग समझना ताकि हम प्रकृति की तरह उस पूर्णता के अंश होने का आभास करें जिसकी पूर्णता अक्षुष्ण बनी रहती है। उस पूर्णता के अंश जो हम सब में बिखरे पड़े हैं वे सब एक होकर --- एक धारा में आकर पूर्णता का स्वरूप ले सकते हैं और इस एकरूप को सजाने का काम ‘प्रेम’ करता है। प्रेम शक्तिशाली संयोजक है।
----- भूपेन्द्र कुमार दवे