My Eventful Poem...!!!
हो रांझरा-वे तेरी साँसों पर तो
थोड़ा-सा वतन का भी हक़ है
बड़े बड़े ख़्वाब लिए छोड़ा था तूने
अपना ही वतन, जिस पे शक हैं
रोज़ी-रोटी मिलेगी पर सह्याबी के
लिए छोड़ा था वतन, जो लगा रंक हैं
कुदरत तो कुदरत ही हैं आज तुझे याद
आया हैं वतन, बूरे वक़्त का यही ढंग हैं
छूटे सारे बंगले कूटे ख़्वाब छोटे, रोटी
हैं तेरी यहाँ वतन,ही परचमों का रंग हैं
एक अदना-सा वाईरस लाया तेरी शान
ठिकाने अब ठिकाना वतन,यही जंग है
वतन की मिट्टी लगती थी गंदी कभी थी
हिमाक़त बुझूँगी-ए-वतनसे आज संग हैं
प्रभु भी करता डोर ढीली अक़्ल के अँधो
की भेजता दूर वतन से अब ना तरंग हैं
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