कभी-कभी यूँ ही मुस्काना मन को भाता है....
पावस के पीत पर्ण को स्वर्ण रंग दे,
हार बना निज स्वप्न वर्ण दे,
वासंती सा मोह जगाना,मन को भाता है...
कभी-कभी यूँ ही मुस्काना मन को भाता है ...
हैं असीम आशाएं सबकी, सतरंगी सुख-स्वप्न सभी के,
मनुज चाहता स्वार्थ सिद्धि हित, सारे मुक्तक भाग्य निधि के,
इससे तो निस्पृह बच्चे की निश्छल इच्छा बन जाना,मन को भाता है..
कभी-कभी यूँ ही मुस्काना मन को भाता है....✍🏻😊