कभी अलविदा न कहना
जी हाँ साथियों! यह मेरे प्रथम उपन्यास का शीर्षक है, जो आज से अपने प्रिय मातृभारती पर धारावाहिक रूप में प्रकाशित होने जा रहा है।
प्रस्तुत उपन्यास मुख्यतः प्रेम के धरातल पर लिखा गया है। संयुक्त परिवार में रह रही नायिका जब नौकरी करने दूसरे शहर में जाती है, तब बदलते परिवेश में किस तरह खुद को समंजित करती है। विभिन्न पात्रों के माध्यम से अलग अलग मनोवैज्ञानिक पहलुओं से गुजरता हुआ उपन्यास अपनी रोचक शैली और सुंदर शब्द शिल्प से पाठक का मन बांधने का प्रयास करता है। जिंदगी के विभिन्न सोपान पर दोस्ती और प्रेम के अलग अलग रंग... परिवार के सदस्यों में स्नेह, अपनत्व और ईर्ष्या के विभिन्न पहलू उजागर करने के साथ बदलते परिवेश में लड़कियों की शिक्षा और संस्कार में बदलाव को भी इंगित करने का प्रयास किया है। एक ही परिवार की दो बेटियों में स्वभावगत असमानता के साथ उनकी जिंदगी के उतार चढ़ाव का, शिक्षा दीक्षा का प्रभाव भी दर्शाने का प्रयास किया है। साथ में रह रही तीन सहेलियों की समानांतर प्रेमकहानी के माध्यम से प्रेम के अलग अलग स्वरूप और प्रेम में पड़ती युवा पीढ़ी के विचार प्रस्तुत किए हैं। उपन्यास में ट्विस्ट और टर्न्स भी हैं, और जिंदगी के कई रंग भी... कई मोड़ों से गुजरती हुई कहानी अंत में नायक द्वारा प्रेम का अनूठे ढंग से इजहार करने पर समाप्त होती है। मानवीय विचारों, सम्वेदनाओं और परिस्थितियों का सूक्ष्म विश्लेषण करती हुई कहानी लिखने में मैं कितनी सफल हुई, यह आप सभी पाठकों की प्रतिक्रियाओं से जानने की अपेक्षा है। सादर....
-डॉ वन्दना गुप्ता