ओम नारायण ॥
वेदांत-ज्ञानकी जिज्ञासाकी आवश्यकता है- क्यों ??
दो चीजोंके बारेमें कोई जिज्ञासा नहीं होती- एक तो जो बिल्कुल साफ साफ हो जिसमें संशय न हो। दूसरे जिससे कोई प्रयोजन सिद्ध न होता हो ।
सामने घड़ी रखी है । क्या किसीको संशय होता है कि 'घड़ी रखी है कि नहीं रखी है ?' सबको मालूम पड़ता है कि यह घड़ी है । क्या कोई पूछेगा कि 'यह घड़ी है ?' और पूछे, तो मालूम पड़ेगा कि बेकार पूछता है । माने बिलकुल साफ-साफ जो चीज मालूम पडती है, उसमें शंका नहीं होती ।
जिनसे कोई प्रयोजन ही न हो, उसमें भी कोई शंका नहीं होती । आपको मालूम है कि 'कौएके कितने दांत होते हैं ?' नहीं मालूम है तो किसी भले मानससे पूछकर देखो-'कौएके कितने दाँत हैं ?' तो वह डॉट देगा- 'क्या बेमतलब प्रश्न पूछते हो ?' निष्प्रयोजन प्रश्न !
आपको ये दो प्रश्न बतायें । यहाँसे वेदांत प्रारम्भ होता है ! जो लोग युक्तिसे सिद्ध कर देते हैं कि 'मैं हूँ'; 'मैं जानता हूँ'; 'मैं आनन्द हूँ'- तो वेदांत कहता है-'हां भाई, यह तो युक्तिसे सिद्ध है । इसके बारेमें शंका करनेकी जरूरत नहीं है ।' परन्तु 'मैं हुँ'--यह तो चींटीको भी मालूम है, चिड़ियाको भी मालूम है, पशुको भी मालूम है । किसको 'यह बात मालूम नहीं है कि 'में हूँ ?' । इसमें वेदांतकी क्या जरूरत है ? परन्तु 'तुम ब्रह्म हो'-क्या यह तुम्हें मालूम है ? तुम अद्वय चैतन्य हो और तुम्हारे सिवा दूसरी कोई वस्तु है नहीं, यह क्या तुम्हें मालूम है ?
'यह तो नहीं मालूम है I'
'तो फिर आओ, देखो, अद्वय चैतन्य कौन है। जिज्ञासा करो। पूछो। देखो ।'
अब दूसरी बात- हम दूसरेको जानते हैं । अगर वह ठग हुआ तो उससे बचेंगे । भलेमानुस हुए तो फायदा उठावेंगे । सप्रयोजन है दूसरेका ज्ञान । अपने आपको ब्रहा जानना, इसमें क्या प्रयोजन है ? इसमें प्रयोजन यह है कि 'देहका जन्म-मरण हमारा जन्म-मरण नहीं हैं '…यह जानना । जन्म-मरणसे छूट गये न !
इस सूक्ष्म-शरीरका स्वर्गनरकमें आना-जाना मेरा आना-जाना नहीं है । पापी होना, पुण्यात्मा होना, सुखी होना, -दुखी होना यह मनका है, मेरा सुखी-दु:खी होना नहीं है । कितने अनर्थोंसे बच गये ? मनका शोक-मोह मेरा शोक-मोह नहीं है । मनकी सुषुप्ति और मनकी समाधि न मेरी सुषुप्ति, न मेरी समाधि ! संसारके सारे बंधन, सारे कर्तव्य, सारे प्राप्तव्य, सारे त्यक्तव्य, सारे ज्ञातव्य समाप्त हो गये । बिना किसी भारके विश्राम प्राप्त हुआ । सम्पूर्ण अनर्थोंकी निवृत्ति होकर परमात्माकी प्राप्ति हुई, यह वेदांतका प्रयोजन है ।
अपना अस्तित्व ज्ञात है और ब्रह्मता अज्ञात है । इम ज्ञात-अज्ञातके सम्बन्धसे माने सामान्यरूपसे आत्माका अस्तित्व ज्ञात है परन्तु विशेषरूपसे ब्रह्मत्व ज्ञात नहीं है, इसलिए- जिज्ञासा करनी चाहिए, जानना चाहिए ।
जाननेसे इस प्रयोजनकी सिद्धि होती है कि जिन चीजोंके कारण तुम डर रहे हो, कि हाय -हाय फिर मरेंगे, फिर जनमेंगे ! नरकमें जायेंगे, स्वर्गमें जायेंगे; जिन कारणोंसे तुम दिनभरमें अपनेको हजार बार पापी-पुण्यात्मा, शोक-मोहसे ग्रस्त समझते हो; इन सब दुखोंको मिटानेवाला यह वेदांत-ज्ञान है, इसलिए सप्रयोजन है ।
॥ ओम नारायण ॥