शुद्ध सुबह है,पवित्र मंत्र है
शुद्ध सुबह है,पवित्र मंत्र है
जीवन के अन्दर शुद्ध व्रत है,
अन्दर बाहर जब जाता हूँ
तुम तक मेरी कथा दिखी है।
जितना आकाश यहाँ बना है
उतना चारों ओर रहा है,
जो हवायें यहाँ बही हैं
वे-वे सारी वहाँ रही हैं।
जल भी सारा एक रहा है
थल भी सारा एक बना है,
जैसी चिड़िया इस घर पर है
वैसी मुझको वहाँ मिली है।
जैसा उजाला यहाँ आया है
वैसा सारा वहाँ रहा है,
जैसे आँसू इधर गिरे हैं
वैसे सारे वहाँ रहे हैं।
जैसी भाषा यहाँ रही है
वैसी वहाँ पर कही गयी है,
जैसी हँसी यहाँ हँसते हैं
वैसी बिल्कुल वहाँ पाते हैं।
जैसी शान्ति यहाँ खोजते
उसी शान्ति में वे मिलते हैं।
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*महेश रौतेला