कहीं दुकानें तो कहीं जला दिए मकान
कुछ हाथ न लगा तो जला दिए इंसान।
खेल नफरत का खेला ऐसा दहशत गर्दों ने,
किसी के ख़्वाब तो किसी के जला दिए अरमान।
मेहनत की कमाई से जो पाई पाई जोड़ी थी,
आज वो दुकान भी दंगाइयों ने तोड़ी थी।
गुनहगार कोई और था इस सारे क़िस्से का,
गई जिसकी जान उसकी ग़लती थोड़ी थी।
जो चैन से सोते थे कभी अपने मकानों में,
खोए रहते थे जो अपने ही अरमानों में।
आज वो लोग मौत के डर से जाग रहे थे,
कुछ दहशत गर्द उनके भी पीछे भाग रहे थे।
क्या हाल बना दिया है मेरे इस शहर का,
इलाज कहाँ से लाऊँ मैं इस फैले ज़हर का?
नफरतों का समंदर न जाने कहाँ से निकला है?
कोई सुराग़ नही मिलता दहशत की इस लहर का।
अमन की ये चिड़िया फिर गीत कभी तो गाएगी,
इस अंधेरी रात की भी सुबह कभी तो आएगी।
सहमी सी सिसक रही है जो पिछले कई दिनों से,
वो अपनी प्यारी दिल्ली फिर चैन से सो पाएगी।
वो अपनी प्यारी दिल्ली फिर चैन से सो पाएगी।
~सुहैल दहलवी~