आ मेरे दोस्त ज़रा सोचें
ज़रा सा गौर फरमाएं।
बहकाते हैं गैर हमको
चलो हम एक हो जाएं।
तू जिस दर पे जाता है
मैं भी चौखट रगड़ता हूं।
उसे तू मस्जिद कहता है
मैं उसको मंदिर कहता हूं।
मांगता तू , दुआ जिससे
मैं भी आशीष लेता हूं।
भरोसा है, तुझे जिसपे
मैं भी, विश्वास करता हूं।
नाम लेकर, लोग जिसका
लड़वाते हैं, दोनों को
उसे तू रहीम कहता है
मैं उसको राम कहता हूं।
दोनों का चमन है ये
ये दुनिया भी है दोनों की।
तू कायनात कहता है
मै ब्रह्मांड कहता हूं।
धड़कती तेरे दिल में है
मेरे मन में भी बसती है।
तू मोहब्बत कहता है
मैं उसको प्रेम कहता हूं।
देश पे मैं भी मरता हूं
वतन पे तू, जान देता है।
समर्पित मैं भी हूं जिसपे
तू भी तो जां छिड़कता है।
तजुर्बेकार है दोनों
अजब फनकार हैं दोनों।
तू मुझको, हज़रत कहता है
मै तुझे, श्रीमान कहता हूं।
#अभिव्यक्ति