क्रम
एक दिन विराम लग जायेगा
साँसें थम जायेंगी,
आलोचना-सराहना का दौर ठप्प हो जायेगा।
खिड़की पर बैठना
पहाड़ों पर जाना,
रास्तों को झाँकना
गीतों पर थिरकना,
उड़ती चिड़िया को देखना,
बन्द हो जायेगा।
प्यार भरे वार्तालाप
आकाश सी खुली मुस्कान,
शौर्य का सौन्दर्य
धरती पर पड़े कदम,
परोपकार के कथानक
स्मृति बन जायेंगे।
उतरते-चढ़ते संदर्भ
सुख-दुख का व्यापार,
त्यौहारों की मस्ती
लोगों का मिलना,मेलों में जाना,
गपशप का होना
जीवन से उतर जायेंगे।
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* महेश रौतेला