रब की मर्जी
लग जाने दो तहोमतें लाख,
नहीं परवाह मुझे ईस ज़माने की,
मेरा रब हे मेरे साथ हर कदम,
नहीं जरुरत अब कोई बहाने की।
पाक़ दिल से कुछ माँगा था,
आज जाना कि वो तो,
मेरा रब ही देना चाहता था,
फिर क्यों करूं ख़ता खुद को उलझाने की।
उसकी मर्जी से तो सब होना है,
वो ही तो यह सब चाहता है,
जब उसकी ही रजा़मंदी है,
फिर क्या जरूरत कीसी को समझाने की।
आशका शुकल "टीनी"