अविभाजित
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श्रृंगार और मैल,
इन्हीं दो रूप में ढाली गयी तेरी गरिमा
चाहा जब सजाया गया और छुड़ाया गया
तेरा श्रृंगार सोना नहीं
पीतल की कलई बन गयी
तेरा दुपट्टा हटाकर तुझे
आँचल से चादर बनाया
फिर चादर में लगे किसी अनचाहे दाग की तरह
मनमाने ढंग से मिटाया गया
तुझे सौ परदों में रखकर भी उघाड़ा गया
तेरे जख्मों से निकली आह का
आनंद उठाया गया
तेरी कराहती जिंदा चीखों को
मर्यादा की चहारदीवारी में चुनवाया गया
तेरे होने का लाभ उठाकर
तेरे ही जन्म को नकारा गया
कितनी बार जन्म देगी
और कितनी बार जन्म लेगी तू
जबकि हर जन्म पर
तुझे ही मिटाने की साजिश की गई
और बार बार मिटाया भी गया
पृथ्वी में आने से पहले ही तेरा अस्तित्व
खण्ड खण्ड में विभाजित किया गया
परन्तु फिर भी तू अविभाजित ही रही
स्त्री ही रही
श्रृँगार ही रही, मैल ही रही
जन्म देती रही, जन्म लेती रही।
©अनामिका चक्रवर्ती अनु
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