मैने देखा है यादों के परिंदों को
उङते हुए कहीं किसी एक कोने आसमान के
रुक कर पंखों को कितनी देर तक फङफङाया करते हैं
शायद बची खुची ख्वाहिशों को भी झटकारते हैं
सोचती हूं खाली हो जाने के लिये आसमान भी कम
होता होगा,क्योंकि भरापूरा जीवन महज लफ्जों और
सोचों के दायरे से छूट कर ही जिया जा सकता है
उसे उम्मीदों के पंख ही परवाज दे सकते हैं...
मैने देखा है यादों के परिंदों को
कभी कभी बैठ सुकून की छत हाथों से ख्वाबों के
दाने चुगते हैं बीते लम्हों के गुनगुने लम्स में आने
वाले कल की तस्वीरें बुनते हैं ,सोचती हूं खाब बुनलेने को
एक अदद घोंसला और उससे बंधा हौसला ही तो चाहिये
उन्हे हम ये एहसास तो दे ही सकते हैं
मैने देखा है यादों के परिंदों को....