ख्वाबों को मुकम्मल करने को मैनें रात का चैन खोया, चैन पाने गया तो ख्वाब अधूरे रह गये, उलझन में इसी मेरी, साल दर साल कटते रहे, आखिर में जाना मैंने, ना ख्वाब पूरे हुए, ना चैन मिला सांसो को, फिर नयी उलझन आयी जिदंगी में, आखिर किया क्या मैंने जागकर इतनी रातो को।