ओ वसन्त
ओ वसन्त
मैं फूल बन जाऊँ
सुगन्ध के लिए,
ओ आसमान
मैं नक्षत्र बन जाऊँ
टिमटिमाने के लिए।
ओ शिशिर
मैं बर्फ बन जाऊँ
दिन-रात चमकने के लिए,
ओ समुद्र
मैं लहर बन जाऊँ
थपेड़ों में बदलने के लिए।
ओ हवा
मैं शुद्ध हो जाऊँ
जीवन के लिए,
ओ सत्य
मैं दिव्य बन जाऊँ
शाश्वत होने के लिए।
ओ स्नेह
मैं रुक जाऊँ
साथ-साथ टहलने के लिए।
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*** महेश रौतेला