मैं घर हूं
और तुम दरवाजा
प्रीत की दीवारों से
झांकता
विश्वास का पुष्प
साकंल की छांव में
महक कर
खिला देता है
आत्मिक सुख सुरक्षा का
सन्तुष्ट भाव
जीवन मूल्यों का
सार्थक अर्थ
प्रारब्ध की प्रेरणा
और कर्तव्यों का
निर्वाह
नेह के आगमन का कारक
अत: हे प्रिये!
तुम 'द्वार' ही रहना
पर काठ के नही
और मैं 'घर' रहूंगी
मकान नही......
छाया अग्रवाल
बरेली