नफरत ने शोर मचाया
शिद्दत से आग लगाई
तशद्दुद का गुबार फैलाया
हर बशर को याद आया
की क्या है उसकी पहचान
वह हिन्दू था या मुसलमान
धुआं इतना ऊंचा उठाया की छू लिया आसमान
मैं पहचान नहीं पा रहा था
ऐसा तो ना था मेरा हिंदुस्तान
फिर आए कुछ नवजवान
उनकी आवाज़ में थी एक नई जान
एक नई सोच, एक नई उड़ान
चेहरे पे बापू और चाचा वाली मुस्कान
वो अपने साथ लाये मोहब्बत का तूफान
जिस में उड़ गया गुरूर का सारा गुमान
अब कोई खलिश ना रही और ना कोई ग़म ए जहान
हर तरफ से आवाज़ आई
की हम सब है इंसान।