मेरी सकरात
छूटना नही चाहा तेरी बज़्म से
यादों के घनेरे पहरे नज़र आये
तोड़ना चाहा उन गिरहों को कभी
मजबूती से हम बंधे हुए पाये
जब भी देखा किये हम आईना
मेरे चेहरे में हमें आप नज़र आये
चाहा बहुत खुश रखना खुदा को
नाराज़गी के सौ बहाने नजर आये
काश कि एक दिन ऐसा भी आये
रूठने के तमाम बहाने खत्म हो जाएं
खुश हो जाये मेरा खुदा मुझ से
और जम कर रहम बरसाए
बिखर जाएं फूल बनकर उनके चरणों मे
जीने का मकसद सफल हो जाये
पिघल जाए घी के जैसे तेरी खिचड़ी में
शायद उस दिन मेरी सकरात हो जाये
विनय...दिल से बस यूँ ही