मैं तुझपे लिखूँ कोई कविता, या तुझे गुमनाम ही रहने दूँ .
मैं रोक लूँ फिसलते लफ़्ज़ों को, या फिर मन को मन की कहने दूँ .
मुरीद तुम्हारा अब भी हूँ, भाती है तेरी हर चंचलता
तुझे बाँध लूँ अब मैं बंधन में, या दरिया-सा स्वछंद ही बहने दूँ .
मैं तुझपे लिखूँ कोई कविता, या तुझे गुमनाम ही रहने दूँ.